माँ दुर्गा का द्वितीय स्वरूप – ब्रह्मचारिणी

माँ दुर्गा का द्वितीय स्वरूप – ब्रह्मचारिणी है। ब्रह्म शब्द वेदान्तियों के अनुसार परमात्मा के निराकार और निर्गुण स्वरुप का वाचक है। इनके अनुसार ब्रह्म ही इस दृश्यमान संसार का निमित्त और उपादान कारण है; यही सर्वव्यापक आत्मा और विश्व की जीव शक्ति है, यही वह मूलतत्व है जिससे संसार की सब वस्तुए पैदा होती है तथा जिसमे फिर वह लीन हो जाती है- अस्ति तावन्नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वज्ञं  सर्वशक्तिसमन्वितम् ब्रह्म।ब्रह्म शब्द का प्रयोग धार्मिक साधना या तपस्या के अर्थ में भी किया जाता है। ब्रह्मचारिणी रूप माँ दुर्गा के सतीत्व रूप में प्रतिष्ठित है शाश्वते ब्रह्मणि वर्तते सा ब्रह्मचारिणी। पूर्ण सतीत्व के कारण ही माँ दुर्गा को ब्रह्मचारिणी कहा गया है। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण रूप से ज्योतिर्मय, दिव्यमान एवं अत्यन्त भव्य है, इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बायें हाथ में कमण्डल रहता है।

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माँ दुर्गा का द्वितीय स्वरूप

माँ दुर्गा का द्वितीय स्वरूप ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा कैसे करें

माँ दुर्गा की ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा के लिए प्रातःकाल नित्य क्रिया से निवृत्य होकर अपने घर में ही मंदिर के पास अथवा घर के अंदर जो पवित्र स्थान हो वहां पर मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं बोएं और उस पर कलश स्थापित करें।कलश पर माँ ब्रह्मचारिणी की मूर्ति स्थापित करें। इसके उपरांत माता का ध्यान, स्त्रोत का जप तथा कवच पाठ करना चाहिए। एतदर्थ अधोलिखित शलोको का पाठ शुद्ध तन तथा मन से करना चाहिए। ध्यातव्य है कि बार-बार कलश की स्थापना की आवश्यकता नहीं है केवल प्रतीक रूप में पूजा करनी चाहिए।

माँ दुर्गा का द्वितीय स्वरूप ब्रह्मचारिणी का ध्यान

  • वन्दे वांच्छितलाभायचन्द्रर्घकृतशेखराम्।जपमालाकमण्डलुधराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
  • गौरवर्णास्वाधिष्ठानास्थितांद्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
  • धवल परिधानांब्रह्मरूपांपुष्पालंकारभूषिताम्॥
  • पद्मवंदनापल्लवाराधराकातंकपोलांपीन पयोधराम्।कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीनिम्न नाभि नितम्बनीम्॥

ब्रह्मचारिणी का स्तोत्र  पाठ

  • तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्। ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
  • नवचक्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्। धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
  • शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

माँ दुर्गा का द्वितीय स्वरुप ब्रह्मचारिणी का कवच पाठ

  • त्रिपुरा मे हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलो॥
  • पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
  • षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।अंग प्रत्यंग सतत पातुब्रह्मचारिणी॥

माँ भगवती के ब्रह्मचारिणी रूप के पूजा-अर्चना, ध्यान स्तोत्र एवं कवच पाठ करने से भक्तो में ज्ञान शक्ति का संचार बढ़ जाता है तथा शरीर निरोगी हो जाता है एवं कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होने लगती है।

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