Adhikmas 2020 | अधिकमास, मलमास, पुरुषोत्तम मास कब, क्यों और कैसे ?

Adhikmas | अधिकमास, मलमास, पुरुषोत्तम मास कब, क्यों और कैसे ?Adhikmas 2020 | अधिकमास, मलमास, पुरुषोत्तम मास कब, क्यों और कैसे ? हिंदू कैलेंडर में सौर वर्ष और चांद्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए प्रत्येक तीन वर्ष में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इस वृद्धि को अधिमास, अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं। पुरुषोत्तम मास के संबंध में कहा गया है की जो भक्त इस मास में श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक उपवास, व्रत, श्री विष्णु की पूजा, पुरुषोत्तम माहात्म्य का पाठ, दान आदि शुभ कर्म करता है वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है और अंत में भगवत का सानिध्य प्राप्त करता है।

अधिकमास 2020

पितृ पक्ष के समाप्त होने के साथ ही अधिक मास प्रारम्भ हो गया है यह मास 17 सितम्बर से शुरू हुआ है तथा 16 अक्टूबर 2020 को समाप्त हो जाएगा। 17 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू हो जाएगी। इस बार आश्विन मास में अधिमास का ऐसा शुभ संयोग 160 वर्ष बाद बना है। ऐसा संयोग फिर वर्ष 2039 में बनेगा।

Adhikmas | अधिकमास क्यों, कब और कैसे होता है ?

हम सभी जानते हैं कि भारतीय हिंदू कैलेंडर की गणना सूर्य मास और चंद्र मास के आधार पर की जाती है। सौर-वर्ष का मान औसतन 365 दिन, 6 घंटे एवं 11 सेकंड का होता है । जबकि चंद्र वर्ष का औसतन मान 354 दिन एवं लगभग 9 घंटे का होता है। इस तरह से यदि दोनों वर्षमानों का अंतर निकाला जाए तो प्रत्येक वर्ष लगभग 11 दिन का अन्तर पड़ता है जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इस अन्तर में सामंजस्य स्थापित करने के लिए तीन साल में एक चंद्र मास 12 मास के स्थान पर 13 मास का हो जाता है। इसमें 1 मास अधिक होने के कारण इस मास को अधिकमास का नाम दे दिया गया। वस्तुतः ऐसी स्थिति अपने आप ही हो जाती है, क्योंकि जिस चंद्र मास में सूर्य-संक्रांति नहीं पड़ती, उसी को “अधिकमास” की संज्ञा दे दी जाती है।

यस्मिन मासे न संक्रांति: संक्रांतिदवयमेव वा।
मलमास स विज्ञेयो मासे त्रिंशत्तमे भवेत्।
अर्थात दो अमावस्याओं के भीतर सूर्य की संक्रांति न होने से उक्त मास को “मलमास” कहते हैं।

अधिकमास का नाम मलमास क्यों पड़ा ?

हिंदू धर्म शास्त्रानुसार अधिकमास के दौरान सभी शुभ और पवित्र कर्म करना अच्छा नहीं माना जाता है। यह मान्यता है कि अतिरिक्त होने के कारण यह मास मलिन हो जाता है। इस कारण इस मास के दौरान हिंदू धर्म के मुख्य संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह तथा सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृहप्रवेश, कोई भी नए कार्य का प्रारम्भ, नई बहुमूल्य वस्तुओं क्रय इत्यादि शुभ कार्य वर्जित है। मलिन मास मानने के कारण ही इस मास का नाम “मलमास” पड़ गया।

Adhikmas | पुरुषोत्तम मास नाम और महत्त्व

वास्तव में अधिमास वा मलमास के दृष्टि से सर्वत्र निंदा की गई है परन्तु पुरुषोत्तम मास की दृष्टि से महत्त्व बताया गया है। अधिकमास के स्वामी भगवान विष्णु माने गए हैं। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिकमास को पुरूषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है।

इस विषय में पुराणों में एक कथा पढ़ने को मिलती है। उसके अनुसार भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए। चूंकि अधिकमास की स्थापना सूर्य और चंद्र मास के बीच सामंजस्य स्थापित करने लिए हुआ, तो इस अतिरिक्त मास का स्वामी बनने के लिए कोई भी देवता तैयार ना हुआ। ऐसी विकट स्थिति में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से प्रार्थना किया आप ही इस मास बन जाये। भगवान विष्णु ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मल मास के साथ “पुरुषोत्तम मास” हो गया।

Adhikmas | पुरुषोत्तम मास का महत्त्व

मलमास या अधिमास के रूप में इस माह की सर्वत्र निंदा की गई है परंतु पुरुषोत्तम मास के रूप में इस मास के असीम महत्व को दर्शाया गया है। भगवान विष्णु ने इस मास का नाम पुरुषोत्तम मास देकर कहां है कि अब मैं स्वयं इस मास का अधिपति हो गया हूं। इस नाम से समस्त विश्व पवित्र होगा तथा मेरी सादृश्यता को प्राप्त करेगा। इस मास की पूजा समस्त जन के द्वारा की जाएगी और पूजा करने वाले लोग धन्य-धान्य से परिपूर्ण होंगे।

यह भी कहा गया है कि इस मास में नियमपूर्वक संयमित होकर, भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा अर्चना करने से अलौकिक आध्यात्मिक शक्ति शीघ्र ही प्राप्त होती है। शिव पुराण में मलमास अधिवास या पुरुषोत्तम मास को साक्षात भगवान शिव का स्वरूप कहा गया है देवताओं के द्वारा कहा गया है —
मासनामधिमासत्वं व्रतानां त्वं चतुर्दशी अर्थात मास में अधिमास और व्रत में चतुर्दशी साक्षात् शिवजी हैं। इस प्रकार स्पष्ट है की अधिमास विष्णु और शिव दोनों को प्रिय है अतः इस मास में स्वयं के कल्याण के लिए अवश्य ही भगवत भक्ति में लीन होना चाहिए। श्रावण मास में शिवजी का महत्त्व 

Adhikmas | अधिकमास वा पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए

मलमास में आध्यात्मिक लोगों को ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन, व्रत- उपवास, पूजा- पाठ इत्यादि कार्य करना चाहिए। पुराण के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ- हवन के अतिरिक्त वेद , श्रीमद् देवीभगवत गीता, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण, शिव पुराण आदि का श्रवण, मनन और ध्यान करने से श्रेयस फल की प्राप्ति होती है।
अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, इस कारण सम्पूर्ण मास में विष्णु मंत्रों का जाप करना चाहिए ऐसा करने से मनोवांछित फल मिलती है। ऐसा कहा जाता है कि पुरुषोत्तम मास में विष्णु मंत्र का जाप करने वाले भक्त को श्री विष्णु जी स्वयं
समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होने का आशीर्वाद देते हैं। Adhikmas | अधिकमास, मलमास, पुरुषोत्तम मास कब, क्यों और कैसे ?

Adhikmas | पुरुषोत्तम मास में कृत कार्य का फल

हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। संपूर्ण भारत की हिंदू धर्मपरायण जन इस मास में पूजा-पाठ, भगवतभक्ति, व्रत-उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्यों में संलग्न रहती है। यह मान्यता है कि अधिकमास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य मास में किए गए पूजा-पाठ से कहीं अधिक फल मिलता है। कहा गया है —-
कहा गया है की जो भक्त इस मास में श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक उपवास, व्रत, श्री विष्णु की पूजा, पुरुषोत्तम माहात्म्य का पाठ, दान आदि शुभ कर्म करता है वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है और अंत में भगवत का सानिध्य प्राप्त करता है। भक्त के सभी अनिष्ट समाप्त हो जातें हैं।

अधिकमास के संदर्भ में पुराण में उल्लिखित कथा

“अधिकमास” के संदर्भ में पुराणों में एक कथा सुनने को मिलती है। यह कथा दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध से जुड़ी है। पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप अपने कठोर तप से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया और उनसे अमरत्व का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने उसे अमरता के स्थान पर कोई भी अन्य वर मांगने को कहा।

हिरण्यकश्यप ने वर के रूप में यह याचना किया कि मुझे संसार का कोई नर, नारी, पशु, पक्षी, देवी-देवता या असुर नहीं मार सके। वह वर्ष के 12 महीनों में मृत्यु को प्राप्त ना हो। जब मेरी मृत्यु हो, तो न दिन का समय हो, न रात का। मैं न किसी अस्त्र से मरू, न किसी शस्त्र से। मेरी मृत्यु न घर में हो न घर से बाहर। ब्रह्मा जी ने कहा ऐसा ही होगा।

ब्रह्मा जी के द्वारा इस वरदान के मिलते ही हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर मानने लगा और उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने अधिक मास में नरसिंह अवतार यानि आधा पुरुष और आधे शेर के रूप में प्रकट होकर, शाम के समय, देहरी के नीचे अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीर कर मार दिया। इस कथा से यह स्पष्ट है की अधिकमास में विशेष प्रयत्न शत्रु का नाश होगा।

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