नवरात्रि पूजन 21मार्च 2015 कब और कैसे करें

किसी भी पूजा की सबसे मुख्य पहलू होता है की पूजा कब और कैसे करे उसी सन्दर्भ में यहाँ नवरात्रि पूजन 21मार्च 2015, कब और कैसे करें बताने का प्रयास किया गया है। नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री के रूप में विराजमान होती है।

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माता दुर्गा के प्रथम रूप 

माता दुर्गा के प्रथम रूप “माँ शैलपुत्री” की उपासना के साथ नवरात्रि प्रारम्भ होती है।शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में उत्पन्न माता दुर्गा के इस रूप का नाम शैलपुत्री है। पार्वती और हेमवती इन्हीं के नाम हैं। माता के दाएँ हाथ में त्रिशूल तथा बाएँ हाथ में कमल का फूल है। माता का वाहन वृषभ है।माता शैलपुत्री की पूजा-अर्चना इस मंत्र के उच्चारण के साथ करनी चाहिए-

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

पूजन समय

भारतीय ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार नवरात्रि पूजन द्विस्वभाव लग्न में ही करना चाहिए। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मिथुन, कन्या,धनु तथा कुम्भ राशि द्विस्वभाव राशि होते है। अतः हमें इसी लग्न में पूजा प्रारम्भ करनी चाहिए।२१ मार्च २०१५ प्रतिपदा के दिन द्विस्वभाव लग्न का समय निम्न प्रकार से है।

कुम्भ लग्न 4:42 – 6:09

मिथुन लग्न 11:05 – 13:19

कन्या लग्न –  17:58 – 20:12

मिथुन लग्न में पूजा करना श्रेयस्कर होगा क्योंकि अभिजीत मुहूर्त (१२:०४-१२:५२) जो ज्योतिष शास्त्र में स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना गया वह भी इसी लग्न में पड़ रहा है।

पूजन सामग्री

माता दुर्गा की प्रतिमा, लाल वस्त्र , कलश, नारियल, पांच पल्लव आम का,पुष्प, अक्षत , रोली, पूजा प्लेट, धुप तथा अगरबती,गंगाजल, कुमकुम, गुलाल,पान, सुपारी,चौकी,दीप,नैवेद्य,कच्चा धागा,दुर्गा सप्तसती पुस्तक,चुनरी, सिक्का, माता दुर्गा की विशेष कृपा हेतु संकल्प तथा षोडशोपचार पूजन के बाद, प्रतिपदा तिथि को, नैवेद्य के रूप में गाय का घृत मां को अर्पित करना चाहिए तथा पुनः वह घृत ब्राह्मण को दे देना चाहिए।

पूजा का फल

वैसे तो गीता में कहा गया है- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन अर्थात आपको केवल कर्म करते रहना चाहिए फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। फिर भी प्रयोजनम् अनुदिश्य मन्दो अपि न प्रवर्तते सिद्धांतानुसार विना कारण मुर्ख भी कोई कार्य नहीं करता है तो भक्त कारण शून्य कैसे हो सकता है। माता सर्व्यापिनी तथा सब कुछ जानने वाली है एतदर्थ मान्यता है कि माता शैलपुत्री की भक्तिपूर्वक पूजा करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाये पूर्ण होती है तथा भक्त कभी रोगी नहीं होता अर्थात निरोगी हो जाता है।

प्रथम(प्रतिपदा) नवरात्र हेतु पंचांग विचार

दिन – शनिवार,  तिथि प्रतिपदा, नक्षत्र– उत्तराभाद्रपद, ९:०२ तक, योग – ब्रह्म योग, करन– भव, सूर्योदय– ६: २८, सूर्यास्त– १८:२९ , शुभ मुहूर्त– अभिजीत १२:०४ – १२:५२, राहु काल– ९:२८ -१०:५८

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